सरसराती सी शाम गुज़र जाती है,
मानो कोई पैगाम छोड़ जाती है।
आसमान भी एक चादर सी ओढ़ लेता है,
कुछ अलग ही रंगत में खुद को ढाल लेता है।
ख्वाहिशों का थोड़ा दामन अधूरा सा रहता है,
सूरज के ढलने के बाद ही तो नया सवेरा होता है।
KAUR'S DIARY
सरसराती सी शाम गुज़र जाती है,
मानो कोई पैगाम छोड़ जाती है।
आसमान भी एक चादर सी ओढ़ लेता है,
कुछ अलग ही रंगत में खुद को ढाल लेता है।
ख्वाहिशों का थोड़ा दामन अधूरा सा रहता है,
सूरज के ढलने के बाद ही तो नया सवेरा होता है।